
गढ़चिरौली : गढ़चिरौली जैसे सुदूर और दुर्गम क्षेत्र में भी यदि आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हों, तो नामुमकिन को भी मुमकिन बनाया जा सकता है। हेडरी स्थित लॉयड्स काली अम्मल मेमोरियल अस्पताल के डॉक्टरों ने ऑर्गेनोफॉस्फोरस विषाक्तता (जहर) की शिकार पारसलगुंडी गांव की एक मध्यम आयु वर्ग की महिला को 15 दिनों के संघर्ष के बाद मौत के द्वार से सुरक्षित वापस लाने में सफलता हासिल की है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, 28 दिसंबर 2025 को उक्त महिला को बेहद नाजुक स्थिति में अस्पताल लाया गया था। वह पूरी तरह बेहोश थी, उसे सांस लेने में अत्यधिक तकलीफ हो रही थी और फेफड़ों में गंभीर संक्रमण फैल चुका था। डॉक्टरों ने तुरंत जांच कर ‘ऑर्गेनोफॉस्फोरस पॉइजनिंग’ की पुष्टि की और बिना समय गंवाए आपातकालीन जीवनरक्षक उपचार शुरू किया।
मरीज की स्थिति को देखते हुए उसे मैकेनिकल वेंटिलेटर पर रखा गया। लंबे समय तक वेंटिलेटर पर रहने के कारण डॉक्टरों को ‘ट्रेकियोस्टॉमी’ (गले में श्वसन मार्ग बनाना) करनी पड़ी। जहर के घातक असर के कारण महिला के मस्तिष्क, हृदय और फेफड़ों पर बुरा प्रभाव पड़ा था। उपचार के दौरान उसे दो बार ‘सुप्रावेंट्रिकुलर टैकीकार्डिया’ (दिल की धड़कन का अनियंत्रित होना) के दौरे भी पड़े, जिससे स्थिति अत्यंत भयावह हो गई थी।
तमाम चुनौतियों के बावजूद विशेषज्ञों की टीम ने हार नहीं मानी। इस सफल उपचार का नेतृत्व डॉ. चेतन (मेडिसिन विशेषज्ञ), डॉ. धीरज (एनेस्थेटिस्ट), डॉ. महेंद्र (ईएनटी विशेषज्ञ) इन्होंने किया। वरिष्ठ चिकित्सा अधीक्षक डॉ. गोपाल रॉय के कुशल मार्गदर्शन में टीम के निरंतर प्रयासों और सटीक निगरानी के कारण मरीज ने धीरे-धीरे प्रतिक्रिया देनी शुरू की और अंततः उसे सफलतापूर्वक वेंटिलेटर से हटा लिया गया।
अस्पताल प्रशासन ने एलएमईएल (LMEL) के प्रबंध निदेशक बी. प्रभाकरण के प्रति आभार व्यक्त किया, जिनके विजन के कारण गढ़चिरौली जैसे पिछड़े क्षेत्र में अत्याधुनिक क्रिटिकल केयर सुविधाओं वाला अस्पताल उपलब्ध हो सका। साथ ही, निदेशक कीर्ति रेड्डी के निरंतर प्रोत्साहन को इस सफलता का श्रेय दिया गया।
अस्पताल के अधिकारियों ने बताया कि, यह मामला इस बात का प्रमाण है कि यदि सही समय पर उन्नत तकनीक और अनुभवी डॉक्टरों की टीम मिल जाए, तो सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में भी कीमती जान बचाई जा सकती है। अब महिला पूरी तरह स्थिर है और उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है।

